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DNA ANALYSIS: Japan में Corona महामारी से भी बड़े संकट से जूझ रहे लोग, क्या मिलेगी इसकी Vaccine?

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नई दिल्ली: दुनिया की सभी सभ्यताओं और संस्कृतियों में एक बात समान है कि ये सभी इंसानों के जीवन का सम्मान करती हैं. कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जिसमें अपनी या किसी और की जान लेना सही माना गया हो. हालांकि जापान में पिछले एक वर्ष में कोविड संक्रमण से जितने लोगों की मौत हुई है, उससे अधिक लोगों ने पिछले महीने आत्महत्या की है. यानी जापान में आत्महत्या अब कोरोना से भी बड़ी महामारी बन गई है. जापान का समाज बहुत आधुनिक और समृद्ध है, लेकिन वहां पर आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. यानी जापान के लोगों ने आत्महत्या को जीवन की मुश्किलों और संघर्ष से छुटकारा पाने का एक आसान रास्ता मान लिया है.

पिछले महीने 2 हज़ार 153 लोगों ने की आत्महत्या
जापान में पिछले महीने 2 हज़ार 153 लोगों ने आत्महत्या की. यानी हर दिन वहां पर लगभग 70 लोगों ने अपनी जान ली. जापान में अबतक कोरोना वायरस के संक्रमण से लगभग 2100 लोगों की ही मौत हुई है. यानी कोरोना महामारी से लगभग 10 महीने में जितने लोग मारे गए उससे अधिक लोगों ने सिर्फ एक महीने में आत्महत्या की है.

हैरान करने वाली बात ये है कि जापान में कोरोना वायरस के संक्रमण का असर भी दूसरे देशों के मुकाबले काफी कम है. इसके बाद भी जापान में आत्महत्या के इतने अधिक मामले चिंताजनक हैं.

बेरोजगारी, आर्थिक संकट और भविष्य की चिंता दुनिया भर के लोगों की परेशानी बढ़ा रहे हैं. लेकिन जापान का पारंपरिक समाज और वहां के युवा इससे बहुत ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. कोरोना महामारी के असर से जापान की अर्थव्यवस्था 27 प्रतिशत तक सिकुड़ गई. जापान, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और इसका असर अब वहां के लोगों पर भी दिख रहा है.

आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या विकसित देशों में सबसे अधिक
जापान में आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या विकसित देशों में सबसे अधिक है. वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक औसतन दुनिया भर में हर 1 लाख लोगों में से 10 लोग आत्महत्या करते हैं लेकिन जापान में हर 1 लाख लोगों में से 18 से अधिक लोग अपनी जान ले लेते हैं. यानी जापान में आत्महत्या करने वालों की संख्या पूरी दुनिया के औसत से लगभग दोगुना है.

इसकी एक वजह, जापान की युवा पीढ़ी का क्षमता से अधिक काम करना है. सबसे ज्यादा काम करने के मामले में जापान कई देशों से बहुत आगे है. पूरी दुनिया में जापान पहले नंबर पर है. जहां लोग ऑफिस के काम के बोझ से भी मर जाते हैं. जापान में इसके लिए एक शब्द भी ईजाद किया गया है. ये शब्द है, ‘कारोशी’ जिसका मतलब होता है “काम के बोझ से मौत”.

जिंदगी में सकारात्मक विचारों की कमी
वहां पर न्यूक्लियर फैमिली का कॉन्सेप्ट है, और बहुत से लोग अकेले ही रहते हैं. इनकी जिंदगी में सकारात्मक (Positive) विचारों की कमी होती है और ऐसे लोग आसानी से मानसिक रोगों का शिकार बन जाते हैं. जापान का विकसित समाज Mental Disorders को बीमारी नहीं मानता है, और ऐसे रोगों से पीड़ित हर तीन में से एक व्यक्ति कभी डॉक्टर की सलाह नहीं लेते हैं. यही वजह है कि वहां के समाज में हताशा, निराशा और अकेलापन इतना ज्यादा बढ़ गया है कि लोग जीवन का आनंद लेने की बजाय मौत को गले लगा रहे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक जब भी कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तो उससे जुड़े करीब 135 लोगों का जीवन प्रभावित होता है. ये लोग गहरे दुख और अवसाद में चले जाते हैं. किसी भी जीवन की समाप्ति से उस व्यक्ति के जीवन साथी, बच्चे, परिवार, रिश्तेदार, दोस्त और साथी कर्मचारी बुरी तरह प्रभावित होते हैं. यानी आत्महत्या सिर्फ स्वयं पर की गई हिंसा नहीं है बल्कि ये उस व्यक्ति के करीबी लोगों को भी दुख पहुंचाती है.

महिलाओं की आत्महत्या दर पुरुषों के मुकाबले 4 गुना तक बढ़ गई
अगर आप अपनी नौकरी से खुश नहीं हैं तो आप इसे छोड़ सकते हैं. अगर आप किसी रिश्ते से खुश नहीं हैं तो आप उससे भी अलग हो सकते हैं लेकिन जीवन के साथ आप ऐसा नहीं कर सकते. क्योंकि जीवन का निर्माण आपने नहीं किया है और जिसका निर्माण आप नहीं करते उसे नष्ट करने का अधिकार भी आपके पास नहीं है. हालांकि इस सोच को नकारते हुए रोजाना कई लोग अपनी जान ले लेते हैं.

– जापान में पिछले वर्ष के मुकाबले अक्टूबर 2020 में महिलाओं की आत्महत्या दर पुरुषों के मुकाबले 4 गुना तक बढ़ गई.

– इसकी एक वजह ये भी है कि जापान में Hotel, Food Service और Retail Indutries में ज्यादातर महिलाएं ही काम करती हैं और इन Sectors में वहां सबसे ज्यादा छंटनी हुई है.

3 बड़े Actors और एक Wrestling Star ने की ​आत्महत्या
कोरोना संक्रमण के बाद पूरी दुनिया में बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां और रोजगार चले गए. हालांकि जापान में इसका असर सभी लोगों पर हो रहा है, पिछले कुछ महीनों में हज़ारों आम लोगों के अलावा वहां के 3 बड़े Actors और एक Wrestling Star भी आत्महत्या कर चुके हैं. यानी जो लोग कामयाबी के शिखर पर होते हैं, वो भी कोरोना संक्रमण के समय खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं. ऐसे लोगों की ज़िंदगी, ऊपर से जितनी चमकदार दिखती है, उस जिंदगी में अंदर से बहुत खालीपन होता है. अक्सर जब तक इसका पता चलता है, तब तक बहुत देर हो जाती है.

प्राचीन ग्रीस में आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के लिए ये नियम था…
आत्महत्या हिम्मत की नहीं बल्कि कायरता की निशानी है. किसी भी देश के लोग आत्महत्या क्यों करते हैं ये इस बात पर निर्भर करता है कि वहां का समाज इस बुराई को लेकर क्या सोचता है.

आत्महत्याओं को रोकने की कोशिशें प्राचीनकाल से चली आ रही हैं. प्राचीन ग्रीस में आत्महत्या करने वाले व्यक्ति को अंतिम संस्कार से वंचित कर दिया जाता था. प्राचीन रोम में भी आत्महत्या गैरकानूनी मानी गई थी.

– हिंदू धर्म में भी आत्महत्या को पाप माना जाता है और इसकी निंदा की जाती है. लेकिन फिर भी ये सिलसिला हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है. यानी जीवन की शुरुआत के साथ ही मनुष्य ने इसे खत्म करने के तरीके और बहाने भी तलाश लिए.

– दुनिया में World Suicide Prevention Day की शुरुआत वर्ष 2003 में हुई थी.

– माना जाता है जापान के समाज ने आत्महत्या को एक सच्चाई की तरह स्वीकार कर लिया है. और कई मामलों में तो इसे नैतिक रूप से सही फैसला भी माना जाता है.

– माना जाता है इसकी शुरुआत जापान में सैंकड़ों वर्ष पहले Samurai नामक योद्धाओं ने की थी. ये योद्धा अपने सम्मान की रक्षा करने के लिए हारा-किरी कर लेते थे. जापानी भाषा में हारा-किरी का अर्थ चाकू मारकर आत्महत्या करना होता है और ऐसा करने वालों को वहां पर सम्मान की नज़र से देखा जाता था.

– अब जापान में आत्महत्या के खिलाफ लोगों में जागरुकता लाने की कोशिशें की जा रही है. जापान की सरकार इस वर्ष Suicide पर रोकथाम के लिए 251 करोड़ रुपए खर्च करेगी.

दुनिया भर में करीब 20 करोड़ लोग करते हैं आत्महत्या की कोशिश 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर वर्ष दुनिया भर में करीब 20 करोड़ लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं, जबकि ऐसे लोगों की संख्या इससे भी कहीं ज्यादा है, जिनके मन में एक ना एक बार आत्महत्या का विचार ज़रूर आता है. यानी आप सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं कि जापान में कितने ऐसे लोग होंगे जो प्रति दिन आत्महत्या करने का फैसला लेते होंगे या फिर आत्महत्या करने की कोशिश करते होंगे.

दुनिया के दूसरे देशों के लिए क्राइम रेट को कम करना एक बड़ी चुनौती है. हालांकि जापान में अपराध इतना कम है कि वहां की पुलिस के पास नहीं के बराबर काम है.

– वर्ष 2016 में जापान में हर तीन लाख लोगों में सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या हुई और ये दुनिया के विकसित देशों में सबसे कम है.

– अमेरिका में तो जापान के मुकाबले 18 गुना अधिक अपराध होते हैं.

आत्महत्या को रोकने वाली वैक्सीन का इंतजार
यानी जापान में लोगों के जीवन पर अपराधियों का खतरा नहीं है, हालांकि वो खुद ही अपनी जान के दुश्मन बन गए हैं. वर्ष 2009 से लेकर 2019 तक जापान में आत्महत्या करने वालों की संख्या लगातार कम हुई. इसके बावजूद वर्ष 2019 में वहां पर 20 हज़ार लोगों ने आत्महत्या कर ली और पिछले 42 वर्षों में ये आत्महत्या के सबसे कम मामले हैं. हालांकि कोरोना महामारी शुरू होने के बाद सुसाइड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. अभी दुनिया की पहली प्राथमिकता कोरोना वायरस की वैक्सीन तैयार करना है. लेकिन जापान के लोगों को कोरोना वैक्सीन के साथ आत्महत्या को रोकने वाली वैक्सीन का भी इंतजार है.



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