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DNA ANALYSIS: भारत की नई पहचान बनने जा रहे नए संसद भवन का बनना क्यों है जरूरी, जानिए 10 खास बातें

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नई दिल्लीः क्या आपने कभी उस भावना के बारे में सोचा है जब आप किराए का मकान छोड़कर पहली बार अपने खुद के मकान में गृह प्रवेश करते हैं. 10 दिसंबर को भारत के लोकतंत्र में भी ऐसे ही अध्याय की शुरुआत हुई, जब भारत के प्रधानमंत्री ने देश के नए संसद भवन का भूमि पूजन किया. ये नई इमारत 93 साल पुराने वर्तमान संसद भवन की जगह लेगी और इसका निर्माण 2022 तक पूरा हो जाएगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की आज़ादी की नींव रखने वालों में से एक शहीद भगत सिंह ने 91 वर्ष पहले वर्तमान संसद भवन में एक बम फेंका था. तब भारत में अंग्रेज़ों का शासन था और उस समय आज के संसद भवन को Central Legislative Assembly. कहा जाता था.

भगत सिंह ने बम फेंकने के पीछे तर्क ये दिया था कि बहरों तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए धमाकों की आवश्यकता होती है. तब भगत सिंह ने बम के साथ कुछ पर्चे भी फेंके थे. जिनमें ब्रिटिश सरकार के कुछ नए कानूनों का विरोध किया गया था जब भगत सिंह ने अपनी आवाज़ उठाई. उस समय Central Legislative Assembly में मोती लाल नेहरू से लेकर मोहम्मद अली जिन्नाह तक मौजूद थे. लेकिन उस समय इस भवन में मौजूद किसी भारतीय नेता ने भगत सिंह का साथ नहीं दिया. हालांकि उन धमाकों की गूंज ने ब्रिटिश सरकार को हैरान कर दिया था और अंग्रेज़ों की समझ में आ गया था कि अहिंसा को परम धर्म मानने वाले भारत के लोग जब क्रांतिकारी बनते हैं तो वो अपनी आवाज़ हुकूमत तक पहुंचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

पुराने संसद भवन की जगह को क्यों न राष्ट्रीय स्मारक में बदल दिया जाए?
कल 10 दिसंबर को जब नए संसद भवन की नींव रख दी गई है तो सवाल उठता है कि नए संसद भवन के निर्माण के बाद पुराने संसद भवन की उस जगह को क्यों न राष्ट्रीय स्मारक में बदल दिया जाए, जहां से भगत सिंह ने बम फेंके थे. आज हम इसी मांग को आधार बनाकर देश के नए संसद भवन के शिलान्यास का विश्लेषण करेंगे. इसे आप नए भारत के नींव पूजन का विश्लेषण भी कह सकते हैं.

सांकेतिक ग़ुलामी से देश को मुक्ति
संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है लेकिन भारत में लोकतंत्र के इस मंदिर की इमारत का निर्माण 93 वर्ष पहले अंग्रेज़ों ने किया था. तब वो इसी इमारत में बैठकर भारत को सदियों तक ग़ुलाम बनाए रखने के मसौदे और क़ानून तैयार किया करते थे. 1947 में अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा लेकिन 73 वर्षों के बाद भी भारत की सरकारें इस सांकेतिक ग़ुलामी से देश को मुक्ति नहीं दिला पाईं. लेकिन कल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के नए संसद भवन का भूमि पूजन किया और उम्मीद की जा रही है कि अगले 21 महीनों में देश को नया संसद भवन मिल जाएगा और जब 2022 में भारत आजादी की 75वीं सालगरिह मनाएगा. तब ये संसद भवन देश को समर्पित कर दिया जाएगा.

इसी साल 5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन किया गया था. राम मंदिर उस जगह पर बनाया जा रहा है जिस जगह का अत्याचारी मुगलों ने अतिक्रमण कर लिया था. लेकिन देश में राम राज्य की स्थापना के लिए अंग्रेजों की ग़ुलामी की यादों और संकेतों को भी मिटाना ज़रूरी है और इसकी शुरुआत हो गई है.

आप इसे नए भारत का नया संसद भवन भी कह सकते हैं.

-नया संसद भवन त्रिभुज के आकार का होगा जो 64 हज़ार 500 वर्ग मीटर इलाके में फैला होगा, जबकि पुराना संसद भवन गोलाकार है जो 47 हज़ार 500 वर्ग मीटर इलाके में फैला हुआ है.

-नए संसद भवन में लोकसभा में 888 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था होगी. फिलहाल भारत में लोकसभा की 543 सीटें हैं.

-इसी तरह नए संसद भवन की राज्यसभा में 384 सदस्य बैठ पाएंगे, जहां फिलहाल 245 सीटें हैं. जब नए संसद भवन में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई जाएगी तो इसके लिए निर्धारित हॉल में 1 हज़ार 272 सदस्यों के एक साथ बैठने की व्यवस्था होगी.

-फिलहाल दोनों सदनों की संयुक्त बैठक सेंट्रल हाॅल में होती है जहां सिर्फ़ 430 सीटें हैं. ऐसे में अतिरिक्त कुर्सियां लगाकर किसी तरह से काम चलाया जाता है.

-2026 में भारत में लोकसभा की सीटों के लिए परिसीमन होना है और संभावना है कि तब लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 800 तक जा सकती हैं. इसलिए भविष्य को देखते हुए नए संसद भवन में बैठने के लिए 150 प्रतिशत अधिक सीटों की व्यवस्था की गई है.

-नया संसद भवन पूरी तरह से भूकंप रोधी होगा और इसे सांसदों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा. आपको याद होगा 13 दिसंबर 2001 को देश की संसद पर आतंकवादी हमला हुआ था. नए संसद भवन में सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा जाएगा.

-इसके अलावा नया संसद भवन पूरी तरह से Eco Freindly होगा , जहां बिजली की खपत भी पहले के मुकाबले 30 प्रतिशत कम होगी. फिलहाल संसद भवन का बिजली बिल करोड़ों रुपये में आता है.

-सांसद जिन सीटों पर बैठेंगे वहां उन्हें आधुनिक Gadgets का इस्तेमाल करने की सुविधा भी मिलेगी.

-नए भवन का निर्माण करीब साढ़े 900 करोड़ रुपये में होगा, जबकि अंग्रेज़ों के ज़माने में मौजूदा संसद भवन के निर्माण पर 83 लाख रुपये खर्च हुए थे.

नए संसद भवन की राह में मुश्किलें
लेकिन अगर आपको लग रहा है कि नए भारत को नया संसद भवन बहुत आसानी से मिल जाएगा तो आप ग़लतफ़हमी में हैं क्योंकि,  इसके निर्माण के ख़िलाफ़ भी कई लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुके हैं. नए संसद भवन का विरोध करने वालों का कहना है इसके ज़रिए सरकार Land Use में बदलाव करेगी और इससे पर्यावरण को भी नुकसान होगा. इसी हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से ये आश्वासन मांगा था कि सरकार याचिकाओं पर सुनवाई पूरी होने से पहले भवन के निर्माण का काम शुरू नहीं करेगी. हालांकि कोर्ट ने शिलान्यास और इससे संबंधित Paper Works की इजाज़त दे दी थी.

हमने लोकतंत्र की अति से देश को पहुंचने वाली क्षति की बात की थी और नए संसद भवन के निर्माण का विरोध भी इसी का एक उदाहरण है. जहां कुछ लोगो को ग़ुलामी के प्रतीक चिन्ह तो स्वीकार हैं लेकिन आत्म निर्भर भारत का आत्मनिर्भर संसद भवन पसंद नहीं है.

हालांकि इन तमाम विरोधाभासों के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने इस नए भवन का शिलान्यास कर दिया. बहुत सारे विपक्षी नेताओं ने ये कहकर इसका विरोध किया कि भूमि भूजन करके प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ़ एक धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन सच ये है कि इस शिलान्यास कार्यक्रम में सभी प्रमुख धर्मों के धर्मगुरुओं ने प्रार्थना की.

इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा कि ये 130 करोड़ भारतीयों के लिए गर्व का क्षण है. पुराने संसद भवन ने स्वतंत्रता के बाद के भारत को दिशा दी, तो नया भवन आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का गवाह बनेगा. कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि नया संसद भवन पुराने संसद भवन का विकल्प नहीं, बल्कि 21वीं सदी के भारत की ज़रूरत है.

संसद भवन का इतिहास
नया संसद भवन नए भारत का प्रतिनिधित्व करेगा लेकिन वर्तमान संसद भवन का इतिहास भी अपने आप में कम दिलचस्प नहीं है. वर्तमान संसद भवन का उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को हुआ था. इसकी वास्तुकला का काम Sir Herbert Baker (सर हरबर्ट बेकर) को सौंपा गया था.

हबर्ट बेकर चाहते थे कि संसद भवन त्रिकोण आकार का हो और उसके हर कोण पर सदन और बीच में एक सेंट्रल हॉल बनाया जाए. लेकिन तब British Architect Sir Edwin Lutyens ने इसका विरोध किया था. उन्होंने अपने प्रस्ताव में इसे गोल आकार देने का सुझाव रखा था. Herbert Baker के सुझाव को नज़रअंदाज़ करते हुए अंग्रेज़ों ने Edwin Lutyens के प्रस्ताव को मान लिया था.

इसके अलावा संसद भवन के अंदर सेंट्रल हॉल की दिशा में मौजूद दीवारों पर हाथ से बनाई हुई कई तस्वीरें लगी हैं. ये तस्वीरें भारत के इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्शाती हैं. लोकसभा के पहले स्पीकर जी. वी. मावलंकर ने इसके लिए एक समिति का गठन किया था और इन तस्वीरों को बनाने के लिए देशभर से चित्रकारों को आमंत्रित किया था.

वर्तमान संसद भवन से जुड़ा एक रोचक तथ्य ये भी है कि जब कोई नया सांसद, संसद भवन में पहुंचता है तो वो भटक जाता है. ऐसा इस भवन के डिजाइन की वजह से होता है. गोल आकार होने की वजह से संसद भवन के अन्दर ज़्यादातर मोड़ एक जैसे लगते हैं, जिसकी वजह से कई सांसदों को इस इमारत को समझने में समय लग जाता है.

संसद भवन से जुड़ा दिलचस्प किस्सा
वर्तमान संसद भवन से जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा है. जब संसद भवन बनना शुरू हुआ तो इसकी छत काफी ऊंची बनाई गई थी. ऐसा इसलिए किया गया था, क्योंकि ऊंची छतों वाले कमरे ठंडे रहते हैं. लेकिन इससे भवन के अंदर बात करने वालों की आवाज़ें गूंजने लगी थीं और किसी को किसी की बात सुनाई नहीं दे रही थी. इसके बाद इस पर काफ़ी विचार विमर्श हुआ और संसद भवन की सीलिंग को लगभग 11 फीट नीचे लाया गया.

लेकिन नैतिक तौर पर इसका कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि तब Central Legislative Assembly में बैठने वाले अंग्रेज एक दूसरे की बात तो साफ साफ सुनने लगे. लेकिन भारत के करोड़ों लोगों की आवाज़ उन्हें सुनाई नहीं दे रही थी और अंग्रेज़ों तक आवाज़ पहुंचाने के लिए ही भगत सिंह ने संसद भवन में धमाका किया था. 

कल 10 दिसंबर था और ये शायद संयोग ही है कि आज से 109 वर्ष पहले 12 दिसंबर 1911 को कलकत्ता की जगह दिल्ली को भारत की नई राजधानी बनाने की घोषणा की गई थी. तब ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी Queen Mary of Teck भारत आए थे और उनके सम्मान में उत्तरी दिल्ली में, दिल्ली दरबार लगाया था जिसमें करीब ढाई लाख लोगों ने हिस्सा लिया था. इसके बाद दिल्ली के एक बड़े इलाके को अंग्रेज़ों की ज़रूरतों के हिसाब से डिजाइन करने का काम शुरू हुआ. इसकी ज़िम्मेदारी British Architect-Sir Edwin Lutyens और Sir Herbert Baker (हरबर्ट बेकर) को सौंपी गई थी. Edwin Lutyens के नाम पर ही इस इलाके को Lutyens Delhi कहा जाने लगा.

आज संसद भवन इसी Lutyens Delhi में है. लेकिन अब सिर्फ़ संसद भवन ही नहीं, बल्कि 4 वर्ग किलोमीटर में फैले इस पूरे इलाके का कायाकल्प होने वाला है. ऐतिहासिक तौर पर इस क्षेत्र को Central Vista भी कहा जाता है.

राजपथ के आसपास की 44 महत्वपूर्ण इमारतें, इसी Central Vista Zone में आती हैं, जिसमें संसद भवन के अलावा South Block और North Block भी शामिल हैं. इन्हीं Blocks में भारत सरकार के मंत्रालय और दूसरे महत्वपूर्ण दफ्तर हैं. प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री भी यहीं बैठते हैं.

इस परियोजना के तहत राष्ट्रपति भवन, North Block और South Block की इमारतों में अंदर से बदलाव किए जाएंगे. यानी इनके बाहरी ढांचे को नहीं बदला जाएगा, बल्कि अंदर से इन्हें ज़्यादा आधुनिक बनाया जाएगा. इसे Retro-Fitting कहते हैं.

इसके अलावा उप राष्ट्रपति भवन, निर्माण भवन, Indira Gandhi National Centre for the Arts और National Archives of India की इमारतों में बड़े पैमाने पर परिवर्तन किए जा सकते हैं.

संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और राजपथ देश की ऐतिहासिक धरोहर हैं. लेकिन इनके साथ ग़ुलामी का इतिहास भी जुड़ा हुआ है. राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक जाने वाली सड़क को पूरा देश राजपथ के नाम से जानता है. ये वही सड़क है जहां हर वर्ष गणतंत्र दिवस के मौके पर परेड का आयोजन किया जाता है.

आज़ादी से पहले राजपथ मार्ग को Kings Way कहा जाता था, जिसका अर्थ है- राजा के गुज़रने का रास्ता, इसी तरह जनपथ को पहले Queens Way कहा जाता था यानी रानी के गुज़रने का रास्ता.

आज़ादी के बाद Kings-way का नाम राजपथ कर दिया गया यानी इसके नाम का सिर्फ़ हिंदी अनुवाद किया गया. इसके पीछे की औपनिवेशिक सोच नहीं बदली गई. भारत से ब्रिटिश राज चला गया लेकिन राजपथ नहीं गया. अब दिल्ली की इस पहचान को बदलने की तैयारी कर ली गई है.

राजपथ से राजसी आन बान और शान की झलक मिलती है यानी ऐसा लगता है कि देश में शायद अभी भी राजा और प्रजा वाला माहौल है.

भारत के स्वाभिमान का साक्षी राजपथ
आज़ादी के बाद राजपथ, भारत के स्वाभिमान का साक्षी भी बना क्योंकि, यही वो मार्ग है जहां हर वर्ष भारत अपनी सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करता है. लेकिन इसके ब्रिटिश इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता. इसलिए राजपथ को अब भारत पथ बनाए जाने की ज़रूरत है.

क्योंकि अंग्रेज़ों और मुगलों ने भारत की पहचान को बदलने की जो कोशिश की. उसे वापस पाने का यही सही समय है. पहचान मिटाने की इसी कोशिश के तहत कभी मुंबई को बॉम्बे, चेन्नई को मद्रास, कोलकाता को कलकत्ता और दिल्ली को डेल्ही कर दिया गया, गुलाम मानसिकता के शिकार लोगों ने पहले इसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया और फिर वर्षों तक ग़ुलामी की इस पहचान को ही अपनी असली पहचान मानकर चलते रहे और आज भी चल रहे हैं. लेकिन याद रखिए जो देश अपनी जड़ों को भुला देता है, उस देश को दुनिया कभी सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाती.



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