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DNA ANALYSIS: पाकिस्तान के तानाशाह की ज़िद ने कैसे एक हाथी के जीवन के 35 वर्ष छीन लिए

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नई दिल्लीः अब हम आपको उदासी, अकेलेपन और उम्मीद की एक ऐसी कहानी दिखाएंगे, जो आपको जीवन के प्रति एक नया नज़रिया देगी. ये कहानी दुनिया के सबसे अकेले और उदास हाथी और उसे मिले नए साथी की है. इस हाथी का नाम कावां है. ये हाथी पाकिस्तान में इस्लामाबाद के एक चिड़ियाघर में 35 वर्षों तक बंद रहा. दुनिया इसे World’s Lonliest Elephant यानी दुनिया का सबसे अकेला और उदास हाथी कहकर भी बुलाती है. लेकिन अब इस हाथी के जीवन का कायाकल्प हो गया है. क्योंकि इस हाथी को उसका नया घर और एक नया साथी मिल गया है.

ये हाथी इस्लामाबाद से कम्बोडिया की वाइल्ड लाइफ सेंचुरी पहुंच चुका है. इस्लामाबाद हाई कोर्ट में इस हाथी की आज़ादी के लिए एक लंबा मुकदमा चला जिसके बाद 21 मई 2020 को कोर्ट ने इस हाथी को कम्बोडिया शिफ़्ट करने का फ़ैसला सुनाया. अब इस हाथी के अच्छे दिन आ गए हैं. क्योंकि अब ये पाकिस्तान के चिड़ियाघर से निकल कर कम्बोडिया के जंगलों में है. वहां इसे इसका एक नया दोस्त भी मिल गया है. कोरोना काल से पहले जब लोग किसी से मिलते थे तो एक दूसरे से हाथ मिलाया करते थे. लेकिन हाथियों की दुनिया में जब कोई हाथी किसी दूसरे हाथी से मिलता है तो वो सूंड मिलाकर एक दूसरे का स्वागत करते हैं.  ऐसा ही इस हाथी ने अपने नए साथी को देखकर किया.

लेकिन कावां की कहानी की इस Happy Ending के पीछे उदासी और अकेलेपन की एक लंबी कहानी छिपी है. कहानी श्रीलंका में वर्ष 1985 में शुरू होती है. जब इस हाथी का जन्म श्रीलंका में हुआ था. इसी वर्ष श्रीलंका की सरकार ने पाकिस्तान की सरकार को ये हाथी तोहफे में दिया था. हालांकि इसके पीछे पाकिस्तान के एक तानाशाह की ऐसी ज़िद थी जिसने इस हाथी से उसके जीवन के 35 वर्ष छीन लिए. इस तानाशाह का नाम जनरल ज़िया उल हक़ है.

जनरल ज़िया उल हक़ की बेटी की ज़िद में लाया गया था हाथी
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल हक़ ने अपनी बेटी ज़ैन के साथ अभिनेता राजेश खन्ना की फ़िल्म ‘हाथी मेरे साथी’ देखी थी. ये फिल्म इंसान और हाथी के प्यार भरे रिश्ते पर आधारित थी. इस फ़िल्म को देखने के बाद ही ज़िया उल हक की बेटी ने ज़िद की थी कि उसे भी एक ऐसा ही हाथी चाहिए. बेटी की इस ज़िद के बारे में जब ज़िया उल हक़ ने श्रीलंका की सरकार को बताया तो श्रीलंका की सरकार ने पाकिस्तान को तोहफ़े में हाथी दे दिया. पाकिस्तान पहुंचने के बाद ये हाथी सबसे पहले ज़िया उल हक़ के घर लाया गया जहां उसकी बेटी ने इसके साथ कुछ समय बिताया. अब तक सब अच्छा था, जैसे इंटरवल से पहले किसी फिल्म में होता है. लेकिन फिल्म के विपरीत इंसानों और इस हाथी का ये रिश्ता ज्यादा लंबा नहीं चला. ज़िया उल हक की बेटी इस हाथी से बोर हो गई और इस हाथी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. ये इस कहानी का इंटरवल था.

इसके बाद इस हाथी को इस्लामाबाद के एक Zoo में भेज दिया गया क्योंकि, पाकिस्तान में नियम है कि राष्ट्र प्रमुख को विदेश यात्रा में मिले तोहफ़े को खज़ाने में जमा कराना पड़ता है. हाथी जानवर था इसलिए उसे सरकारी चिड़ियाघर में भेज दिया गया. यानी एक तानाशाह की ज़िद ने हाथी को जंगल से Zoo में कैद कर दिया और उसका बुरा समय भी शुरू हो गया.

Zoo में 35 वर्षों तक बंद रहा
ये हाथी इस्लामाबाद के Zoo में 35 वर्षों तक बंद रहा और इस दौरान इसने कई यातनाएं झेलीं. ये हाथी धीरे-धीरे उदास रहने लगा. इसकी उदासी को दूर करने के लिए वर्ष 1990 में यानी उसके पाकिस्तान पहुंचने के पांच साल बाद बांग्लादेश से एक हथिनी को भी लाया गया जिसका नाम सहेली था. लेकिन चिड़ियाघर में हाथी की देखभाल ठीक तरीके से नहीं की गई. इस वजह से हाथी धीरे-धीरे मानसिक रूप से बीमार होने लगा  जिसके बाद चिड़ियाघर में ही उसे ज़जीरों से बांध दिया गया.

अपने साथ हुई क्रूरता को कभी नहीं भूल पाया
वर्ष 2012 में हीट स्ट्रोक यानी भीषण गर्मी में दिल का दौरा पड़ने से जब कांवा की दोस्त सहेली नाम की हथिनी की मौत हो गई. तब कावां और भी अकेला हो गया और पहले से भी ज़्यादा उग्र हो गया. साथी की मौत ने उसे पूरी तरह अकेला कर दिया और वो डिप्रेशन में चला गया. कहते हैं कि हाथियों को सबकुछ याद रहता है. यानी वो कोई बात नहीं भूलते. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हाथियों के मस्तिष्क का Temporal Lobe आकार में बहुत बड़ा होता है और टेम्पोरल लोब ही मस्तिष्क की वो जगह है, जहां स्मृतियां यानी यादें जमा होती हैं. कावां के साथ भी ऐसा ही हुआ, वो उसके साथ हुई क्रूरता को कभी भूल नहीं पाया.

पैरों में वर्षों तक बेड़ियां बंधे होने की वजह से उसके नाखून भी टूट चुके थे. यही नहीं उसका वज़न भी काफ़ी बढ़ गया था. ये ठीक ऐसा ही था जैसा किसी अकेले और उदास हो चुके इंसान के साथ होता है. इस हाल में हाथी को पाकिस्तान से कम्बोडिया भेजना आसान नहीं था. ऐसे में जानवरों के लिए काम करने वाली अमेरिका की सिंगर शेअर (Cher) और ऑस्ट्रिया की एक संस्था Four Paws Intetnational की एक टीम इस्लामाबाद के उस Zoo में पहुंची, जहां ये हाथी बंद था. इस टीम ने तीन महीने तक इसका ख़्याल रखा और विशेष डाइट की मदद से इस हाथी का वजन 450 किलोग्राम तक घटाया गया.

पिछले महीने की 24 तारीख को इस्लामाबाद में इस हाथी के लिए फेयरवेल पार्टी भी रखी गई. इस विदाई समारोह में पाकिस्तान के कुछ मंत्री और कुछ सिंगर्स भी शामिल हुए.

35 साल बाद ख़त्म हुआ एकांतवास
पाकिस्तान से कंबोडिया पहुंचने के बाद अब 35 साल के इस हाथी का एकांतवास ख़त्म हो चुका है और इसे एक नया साथी भी मिल गया है. लेकिन दुनियाभर में अब भी ऐसे कई जानवर हैं, जो अपना दर्द बता नहीं सकते, जो ये नहीं कह सकते कि वो डिप्रेशन में है, जो अपनी मुसीबतों के लिए आंदोलन नहीं कर सकते.

दुनियाभर में 10 हज़ार से ज़्यादा Zoo हैं. ये  Zoo जंगल के मुक़ाबले 60 से 100 गुना छोटे होते हैं.

अफ्रीका में पाए जाने वाले हाथियों के पास इतना बड़ा जंगल है कि वो अपने पूरे जीवनकाल में 5 हज़ार वर्ग किलोमीटर के इलाके में घूम सकते हैं.

जबकि एशिया में पाए जाने वाले हाथी जंगलों में रहते हुए 700 से एक हज़ार वर्ग किलोमीटर में विचरण कर सकते हैं.

लेकिन जब इन हाथियों को किसी चिड़ियाघर में लाया जाता है तो ये ज़्यादा चल नहीं पाते और इसकी वजह से इन्हें कई गम्भीर बीमारियां हो जाती हैं.

यही नहीं जंगलों में रहने वाले जानवरों के मुक़ाबले चिड़ियाघर में रहने वाले जानवरों का स्वभाव भी ज़्यादा चिड़चिड़ा हो जाता है.

ब्रिटेन की Oxford University की एक रिसर्च के मुताबिक कैद में रखे गए भालू,  शेर,  बाघ और चीता जैसे जानवर अक्सर तनाव में चले जाते हैं और इनमें से कुछ जानवर तो पागल भी हो जाते हैं.

4 हज़ार 500 हाथियों पर किए गए एक सर्वे के मुताबिक Zoo में रहने वाले हाथियों की औसत आयु घटकर करीब 19 वर्ष रह जाती है, जबकि अपने प्राकृतिक परिवेश में एक हाथी 56 वर्ष तक ज़िंदा रह सकता है.

ऋग्वेद और उपनिषदों में भी हाथी पालने का जिक्र
माना जाता है कि भारत में करीब 6 हज़ार वर्ष पहले इंसानों ने हाथियों को पालना शुरू किया था. ऋग्वेद और उपनिषदों में भी अलग अलग उद्देश्यों से हाथी पाले जाने का उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तो वो ये देखकर हैरान रह गया था कि भारत के सैनिक कितने कुशल तरीके से इतने विशालकाय जानवर को नियंत्रित कर लेते हैं. सिकंदर के खिलाफ लड़ाई में राजा पोरस ने करीब 200 हाथियों को उतारा था और इन हाथियों ने सिकंदर की सेना को काफी नुकसान पहुंचाया था.

चीन क्षेत्रफल में भारत से तीन गुना बड़ा है. लेकिन आज चीन में सिर्फ 250 हाथी ही बचे हैं जबकि भारत में इस समय हाथियों की संख्या लगभग 30 हज़ार है

दांतों के लिए मारा जाता है हाथियों को 
पूरी दुनिया में हाथियों को उनके दांतों के लिए मारा जाता है और यही वजह है कि अफ्रीका में जितने हाथी रोज़ पैदा नहीं होते, उससे ज़्यादा मार दिए जाते हैं. हालांकि दुनिया के सबसे अकेले और उदास हाथी को अब नया घर और नया साथी मिल चुका है. वो कम्बोडिया में अपने जीवन के कुछ आख़िरी वर्ष आज़ाद रह कर बिता पाएगा और हम उम्मीद करते हैं कि वो वहां ख़ुश रहेगा.



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