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DNA ANALYSIS: जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र क्यों है सख्त सुधारों के रास्ते में बाधा?

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नई दिल्ली: आज हम लोकतंत्र की जरूरत से ज्यादा मिठास के दुष्प्रभावों पर बात करेंगे और इस बात का विश्लेषण करेंगे कि कहीं जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र राष्ट्रहित के रास्ते में बाधा तो नहीं डालता? कई बार लोकतंत्र के नाम पर देश में बड़े बड़े फैसले जनता के मूड को आधार बनाकर ले लिए जाते हैं. इसलिए आज ये समझने का दिन है देश में कोई भी फैसला जनता के मूड के आधार पर लिया जाएगा या फिर मेरिट के आधार पर लिया जाएगा. ये सारी बातें हम किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में कह रहे हैं. 

किसान संगठनों ने कृषि क़ानूनों पर केन्द्र सरकार के नए प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है. किसान संगठनों कहा है कि वो सरकार के प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हैं. उन्होंने प्रदर्शन को आगे जारी रखने का भी ऐलान किया. इससे पहले आज सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली छठे दौर की बातचीत रद्द होने के बाद कैबिनेट की एक बैठक हुई. इस बैठक में किसानों को भेजे गए प्रस्ताव पर चर्चा हुई.

इस प्रस्ताव में सरकार ने किसानों को एमएसपी पर लिखित आश्वासन की गारंटी दी है. सरकारी मंडियों को कमज़ोर करने और प्राइवेट मंडियों को बढ़ावा देने के आरोपों पर भी सरकार ने इस प्रस्ताव में जवाब दिया है.

प्रस्ताव में लिखा है कि क़ानून में संशोधन कर राज्य सरकारें प्राइवेट मंडी रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था लागू कर सकती हैं.

किसानों ने पिछली बैठक में ये मुद्दा उठाया था कि नए क़ानूनों से उद्योगपति उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लेंगे. जिस पर प्रस्ताव में लिखा है कि क़ानून में ऐसा कुछ नहीं है और अगर ज़रूरत हुई तो सरकार इस पर फिर से काम करने के लिए तैयार है. इस प्रस्ताव में ये भी लिखा है कि सरकार विवाद निपटाने के लिए किसानों को सिविल कोर्ट जाने का विकल्प दे सकती है. बिजली भुगतान व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा, इसका ज़िक्र भी प्रस्ताव में किया गया है. हालांकि किसान संगठनों ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है और नए कृषि क़ानूनों को रद्द करने की मांग दोहराई है.

विपक्षी पार्टियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की है. इनमें कांग्रेस नेता राहुल गांधी और एनसीपी नेता शरद पवार भी शामिल रहे. इन नेताओं ने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें नए कृषि क़ानूनों को रद्द करने की मांग की गई है. राहुल गांधी ने इन तीनों कानूनों को किसान विरोधी बताया है.

इस पूरे आंदोलन पर राजनीति के बीच किसान संगठनों ने आंदोलन जारी रखने की बात कही है. उन्होंने 12 दिसम्बर तक दिल्ली जयपुर हाइवे और आगरा दिल्ली हाइवे को बंद करने का ऐलान किया है. किसानों ने कहा कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वो 14 दिसम्बर को बड़े पैमाने पर धरना भी देंगे. यानी ये आंदोलन फिलहाल ख़त्म होता हुआ नहीं दिख रहा है.

कुल मिलाकर सरकार और किसानों के बीच अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है. किसान सरकार को झुकाना चाहते हैं और सरकार अभी ऐसा करने से बच रही है. लेकिन अब यहां से सरकार को ये तय करना है कि उसे लोकप्रियता चुननी है या फिर वो जो देश के लिए ठीक है. अगर सिर्फ़ चुनाव जीतना मकसद है तो सरकार को वो कदम उठाना पड़ेगा जो देश के लिए ग़लत है और अगर वो चुनना है जो देश के लिए सही है तो सरकार को जल्द अपना रुख़ साफ़ करना होगा.

क्योंकि अगर सरकार अपना एक सुधार वापस लेगी तो फिर सरकार को बाकी के सभी सुधार भी वापस लेने पड़ेंगे.

भारत में करीब 15 करोड़ किसान परिवार हैं इनमें से सिर्फ़ 10 लाख पंजाब में हैं और नए कृषि कानूनों का सबसे ज़्यादा विरोध भी पंजाब के किसान ही कर रहे हैं. अब अगर सरकार इनके आगे झुक जाती है तो ये संदेश जाएगा कि भविष्य में किसी भी सुधार की प्रक्रिया को लोगों का एक विशेष समूह बंधक बना सकता है और देश की राजधानी दिल्ली को घेरकर अपनी मांगे मनवाई जा सकती हैं.

और अगर ऐसा हुआ तो भारत का 5 ट्रिलियन डॉलर्स की अर्थव्यवस्था बनने का सपना भी दूर हो जाएगा. हालांकि सरकार नए कानून के तहत एपीएमसी और एमएसपी की व्यवस्था को ख़त्म नहीं करना चाहती. सरकार सिर्फ़ ये कह रही है कि अब किसान चाहें तो अपनी फसल सरकारी मंडियों के बाहर भी बेच सकते हैं.

लेकिन कमीशन एजेंटों का एक समूह ऐसा नहीं चाहता. ये एजेंट ही किसानों से उनका अनाज ख़रीदते हैं और फिर यही अनाज बड़े थोक विक्रेताओं को बेचा जाता है. बड़े थोक विक्रेता छोटे थोक विक्रेताओं को ये अनाज बेचते हैं और फिर ये अनाज आपके घर के पास की दुकान तक पहुंचता है और आप वहां से ये अनाज ख़रीदते हैं.

इस प्रक्रिया के दौरान एजेंट्स एक बड़ा हिस्सा कमीशन के तौर पर ले लेते हैं और इसमें सरकार भी कई तरह के टैक्स और फीस जोड़ देती है. ये टैक्स और फीस पंजाब और हरियाणा की सरकारों के लिए कमाई का एक बहुत बड़ा ज़रिया है. इसलिए ये भी संभव है कि इस आंदोलन में सिर्फ़ किसान नहीं, बल्कि कमीशन एजेंट भी शामिल हैं और कुछ सरकारें भी इस आंदोलन को रुकने नहीं देना चाहती हैं.

अब सरकार ये कर सकती है कि वो नए कानूनों को लागू करने पर अड़ी रहे और कानूनों में कोई बड़ा बदलाव न करे. दूसरा तरीका ये है कि सरकार किसानों से बातचीत करे, बीच का कोई रास्ता निकाले लेकिन ये भी सुनिश्चित कर ले कि ये किसान सही मायनों में देश के सभी किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

अगर किसी एक या दो राज्यों की सरकार को इन कानूनों से परेशानी है तो सरकार इन राज्यों को इनके हाल पर छोड़ सकती है क्योंकि भारत में इस समय कई ऐसे राज्य हैं जहां एपीएमसी की व्यवस्था नहीं है और इन राज्यों के किसान पंजाब के किसानों की तुलना में ज़्यादा तरह की फसलें उगा रहे हैं और उसके सही दाम भी पा रहे हैं.

लेकिन सच ये है कि आंदोलन के बहाने से नेताओं ने अपनी राजनीति की दुकानें सजा ली हैं और जरूर से ज्यादा लोकतंत्र की आड़ में शहरों को बंधक बनाने की कोशिश हो रही है.

अब आप एक पल के लिए मान लीजिए कि आपके सामने चुनाव में दो प्रतिद्वंदी खड़े हैं, इनमें से एक बहुत सख़्त डॉक्टर है और दूसरा है मीठी वाणी बोलने वाला एक मिठाई वाला. भारत जैसे देश में संभावना ये है कि मिठाई वाला आसानी से जीत जाएगा क्योंकि, वो आपसे कहेगा कि वो आपको कुछ भी खाने की छूट देगा, आपको सस्ते दामों पर मिठाई देगा और आपको व्यायाम करने के लिए भी नहीं कहेगा, जबकि दूसरी तरफ़ एक सख़्त डॉक्टर आपको ज़रूरत से ज़्यादा कुछ भी खाने पीने से रोकेगा, आपको कहेगा कि व्यायाम करें. अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें और ऐसा सुनिश्चित करने के लिए वो आपकी दिनचर्या को बदलने का प्रयास भी कर सकता है. आपके लिए कुछ नए नियम कायदे भी बना सकता है. ऐसा सुनते ही लोग नाराज़ हो जाएंगे क्योंकि, उन्हें अपनी आज़ादी खतरे में दिखाई देने लगेगी.

आज हमारे देश का लोकतंत्र भी कुछ ऐसा ही हो गया है. जहां बहुत सारे मिठाई वाले चुन लिए जाते हैं और डॉक्टर्स कभी पर्याप्त संख्या में नहीं होते क्योंकि लोग अक्सर स्वस्थ रहने की बजाय स्वच्छंद रहना पसंद करते हैं और यहीं से एक ऐसी व्यवस्था का जन्म होता है जिसे कहा तो लोकतंत्र जाता है लेकिन ये लोकतंत्र धीरे धीरे ज़रूरत से ज़्यादा लोकतंत्र में बदल जाता है.

मिठाई वाले और डॉक्टर का जो उदाहरण हमने आपको दिया वो हमारा नहीं बल्कि ग्रीस के दर्शनशास्त्र के जनक कहे जाने वाले सुकरात ने दिया था. 2300 वर्ष पहले उन्होंने लोकतंत्र की कमियां गिनाते हुए ये कहा था कि वोट देना एक स्किल यानी कौशल है, आप अचानक किसी को भी वोट नहीं दे सकते. ये कौशल लोगों को सीखना पड़ता है. सुकरात लोगों के वोट डालने या लोकतंत्र के ख़िलाफ़ नहीं थे. उनका सिर्फ़ यही मानना था कि जब तक लोगों को सही नेता और सही मुद्दों की समझ न हो, तब तक लोकतंत्र को मज़बूत नहीं बनाया जा सकता. हम भी मानते हैं कि लोकतंत्र एक बहुत खूबसूरत शासन व्यवस्था है लेकिन इसकी भी अपनी कुछ कमियां हैं. इसलिए आज हम राजनीतिक विज्ञान नहीं बल्कि राजनीति के दर्शन शास्त्र की मदद से इन कमियों को समझने की कोशिश करेंगे.

हो सकता है कि हमारा ये विश्लेषण बहुत लोगों को पसंद न आए और लोग हमारी पूरी बात सुने बिना, हमें लोकतंत्र विरोधी बताने लगें. लेकिन गंभीर समस्याओं के सरल जवाब तलाशने की हमारी ज़िद आज हमारे देश को इस मुहाने पर ले आई है. जहां से हम हर सुधार का,  हर नई बात का विरोध करने लगते हैं और ये सब इसलिए होता है क्योंकि कई बार हम ज़रूरत से ज़्यादा लोकतंत्र को ही असली आज़ादी मानने लगते हैं.

हमारी इन बातों को समझने के लिए आपको नीति आयोग के अमिताभ कांत का एक बयान सुनना चाहिए, ये बयान उन्होंने कल दिया था. अमिताभ कांत ने कहा है कि भारत में ज़रूरत से ज़्यादा लोकतंत्र है. इसलिए हमारे यहां कड़े सुधारों का रास्ता बहुत मुश्किल है और इन सुधारों को लागू करने के लिए मज़बूत राजनैतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत पड़ती है. हालांकि अमिताभ कांत ने अपने इस बयान का खंडन किया. लेकिन इससे जो सवाल खड़े होते हैं उस पर बात किया जाना जरूरी है.

भारत 1947 में आज़ाद हुआ था और 1950 में लागू हुए संविधान में भारत को एक लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित किया गया था. यानी एक ऐसा देश जहां जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन होता है. ऐसी ही व्यस्था 2300 साल पहले ग्रीस की राजधानी एथेंस में थी. जिसे लोकतंत्र का जन्म स्थल माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं एथेंस में लोकतंत्र अपने शुरुआती दौर में ही इतना विकृत हो गया था कि लोकतंत्र और जनता के फैसले की आड़ में सुकरात जैसे दार्शनिक को मौत की सज़ा दे दी गई थी. उन पर युवाओं को भ्रष्ट करने का आरोप था और उनकी मौत की सज़ा पर जनता द्वारा ही मुहर लगाई गई थी, इसके बाद सुकरात को ज़हर का प्याला पीना पड़ा था. तब सुकरात ने इसे लोकतंत्र की ख़ामी बताया था.

यानी जब लोकतंत्र सिर्फ जनता के मूड पर आधारित हो जाता है और बड़े बड़े फैसले इसी आधार पर लिए जाने लगते हैं तो फिर सख्त सुधारों की गुंजाइश नहीं बचती.

जनता बार बार अपना मूड कैसे बदलती है इसका एक उदाहरण आपको भारत की राजनीति के परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए. वर्ष 1977 में जनता इंदिरा गांधी से नाराज़ थी और जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया था. लेकिन फिर सिर्फ तीन साल बाद ही जनता का मूड बदल गया और वो एक बार फिर से सत्ता में आ गईं. इसी तरह 1987 में बोफोर्स घोटाला सामने आया था. इसके बाद 1989 में सरकार गिर गई. लेकिन इसके बाद क्या हुआ? इसके बाद भी कांग्रेस कई बार सत्ता में आई और गांधी नेहरू परिवार कई दशकों तक सत्ता का सुख उठाता रहा. जनता ने अपने बदले हुए मूड के साथ कांग्रेस को एक बार फिर स्वीकार कर लिया.

भारत में आज सरकार शायद अपनी बात किसानों को ठीक से समझा नहीं पा रही है और किसानों के बीच भी ऐसे नेताओं की कमी साफ़ दिखाई देती है जो बातचीत की टेबल पर किसी ऐसे निष्कर्ष पर पहुंच सकें जो सबके लिए मान्य हो. रही बात राजनैतिक पार्टियों की तो कुल मिलाकर सभी राजनैतिक पार्टियां सिर्फ़ इलेक्शन मशीन बनकर रह गई हैं. पार्टियां ज़्यादा से ज़्यादा चुनाव लड़ना चाहती हैं और ज़्यादा से ज़्यादा चुनाव जीतना चाहती हैं. हमारे देश में किसी नेता की सफलता भी सिर्फ़ इस बात से आंकी जाती है कि उसने कितने चुनाव जीते हैं. चुनाव जीतना ही सिर्फ लोकतंत्र नहीं है,  बल्कि लोगों द्वारा समझदारी से वोट डालना असली लोकतंत्र है. वोट डालना सिर्फ एक जन्म सिद्ध अधिकार नहीं हो सकता बल्कि लोगों को ये अधिकार हासिल करना सिखाना चाहिए.

और जब ऐसा नहीं होता तो फिर वही होता है जो लोकतंत्र को जन्म देने वाले एथेंस में हुआ था. एथेंस में जिस एरेना में लोकतांत्रिक फैसले लिए जाते थे, उसे पार्थेनन कहा जाता है.  इसे लोकतंत्र का बहुत बड़ा प्रतीक चिन्ह माना जाता है और यही वजह है कि दुनिया के कई बड़े लोकतांत्रिक देशों के नेता यहां जाकर तस्वीरें खिंचवाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ग्रीस के दर्शन शास्त्र में लोकतंत्र की बहुत आलोचना की गई है और जिस एरेना से ग्रीस का लोकतंत्र चलाया जाता था. वहां सिर्फ लुभावने भाषण दिए जाते थे, जिनका तथ्यों और सच्चाई से कोई लेना देना नहीं होता था.

भारत में आज होने वाली राजनीतिक रैलियों की तुलना भी आप ग्रीस के पार्थेनन से कर सकते हैं. जहां लोकतंत्र के नाम पर बड़ी बड़ी बातें तो कही जाती हैं. लेकिन ज़्यादातर मौकों पर इनका तथ्यों और सच्चाई से कोई लेना देना नहीं होता.

ग्रीस के महान दार्शनिक प्लेटो ने अपनी कई पुस्तकों में सुकरात और लोकतंत्र पर उनके विचारों का ज़िक्र किया है. ऐसी ही एक पुस्तक में वो सुकरात और एक व्यक्ति के बीच हुई बातचीत का वर्णन करते हैं जिसमें सुकरात एक देश की तुलना एक समुद्री जहाज़ से करते हुए कहते हैं कि जहाज़ पर सवार लोग जहाज़ की कमान किसे सौंपना पसंद करेंगे. किसी भी व्यक्ति को या फिर उसे जिसे जहाज़ चलाने और समुद्री यात्राओं का अनुभव हो. इस पर दूसरा व्यक्ति जवाब देता है और कहता है कि ज़ाहिर तौर पर एक अनुभवी व्यक्ति को. इस पर सुकरात कहते हैं तो फिर एक देश की ज़िम्मेदारी किसी भी व्यक्ति के हाथ में कैसे सौंपी जा सकती है.

आप आज के भारत की तुलना भी एक ऐसे ही जहाज़ से कर सकते हैं और खुद से ये सवाल पूछ सकते हैं कि इसकी कमान आप सौ दो सौ या पांच सौ लोगों की भीड़ के दम पर भाषणबाज़ी करने वाले नेताओं के हाथ में देना चाहते हैं या फिर ये काम अनुभवी लोगों को करना चाहिए.

20वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में सिर्फ़ 11 लोकतांत्रिक देश थे. वर्ष 1920 में इनकी संख्या बढ़कर 20 हो गई और 1974 में इनकी संख्या 74 हो गई. 2006 आते आते ये संख्या 86 तक पहुंच गई और आज 5 लाख से ज़्यादा आबादी वाले दुनिया के 167 देशों में से 57 प्रतिशत यानी 96 देश खुद को लोकतांत्रिक देश कहते हैं. 21 देशों में किसी न किसी प्रकार की तानाशाही है, जबकि 28 देश ऐसे हैं जिनमें तानाशाही और लोकतंत्र दोनों के लक्षण हैं.

लेकिन इकोनाॅमी इंटेलिजेंस यूनिट्स डेमोक्रेसी इंडेक्स के मुताबिक, दुनिया में सिर्फ़ 20 देश ऐसे हैं जहां सही मायनों में लोकतंत्र है जबकि 55 देश ऐसे हैं जो लोकतांत्रिक तो हैं लेकिन इन देशों के लोकतंत्र में कई कमियां हैं और कमियों वाले लोकतांत्रिक देशों में दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत भी शामिल है और दोनों ही देशों स्थिति बहुत बुरी है.

आज हम लोकतंत्र की इन्हीं कमियों को दुरुस्त करने की बात कर रहे हैं. लेकिन यहां आपको एक बात समझनी होगी और वो ये कि लोकतंत्र का विपरीत हमेशा तानाशाही नहीं होता. जिन देशों में तानाशाही है वहां भी कई बार जनता सत्ता बदल डालती है और जिन देशों में लोकतंत्र है वहां भी कई बार नेता वर्षों तक सत्ता से चिपके रहते हैं.

उदाहरण के लिए वर्ष 2010 में कई अरब देशों में वहां की हुकूमतों के ख़िलाफ़ बड़ी क्रांति की शुरुआत हुई थी लेकिन ज़्यादातर देशों को इससे कुछ ख़ास हासिल नहीं हुआ.

2013 में इजिप्ट में बड़े पैमाने पर सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे थे. इस बीच सेना ने इन प्रदर्शनों को आधार बनाकर तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी का तख़्ता पलट कर दिया और इस तख़्तापलट में शामिल रहे अब्देल फ़तह अल सिसी इजिप्ट के नए राष्ट्रपति बन गए लेकिन इजिप्ट में सिर्फ़ राष्ट्रपति बदला, तानाशाही नहीं गई. मोरसी हटा दिए गए और सिसी कुर्सी पर बैठ गए.

अरब स्प्रिंग का असर लीबिया, यमन और सीरिया जैसे देशों में भी हुआ वहां भी बड़े पैमाने पर सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए लेकिन आज ये सभी देश गृह युद्ध की आग में जल रहे हैं.

इराक़ में सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए अमेरिका ने इतना भयंकर युद्ध लड़ा लेकिन इराक़ को सही मायनों में लोकतंत्र नहीं मिल पाया. 2011 में लीबिया के तानाशाह मुअम्मर अल गद्दाफ़ी को मार गिराया गया. लेकिन 2014 से लीबिया में जो गृह युद्ध शुरू हुआ वो आज भी जारी है.

आज से 10 साल पहले दिसंबर के महीने में ही सबसे पहले ट्यूनिशिया से अरब क्रांति की शुरुआत हुई थी. तब वहां एक सब्ज़ी विक्रेता ने बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए खुद को आग लगा ली थी. इसके बाद अगले 28 दिनों तक ट्यूनिशिया में तत्कालीन राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त प्रदर्शन हुए और राष्ट्रपति को सत्ता से हटा दिया गया. लेकिन ट्यूनिशिया आज भी सही मायनों में लोकतंत्र बनने के लिए संघर्ष कर रहा है.

यानी किसी भी देश के लिए सच में एक लोकतंत्र बनने की राह आसान नहीं है और ये कामयाबी हासिल करने के लिए उस देश की सरकारों और लोगों को अथक प्रयास करने पड़ते हैं.

आज पांच लाख से ज्यादा आबादी वाले 96 देश लोकतांत्रिक हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ज्यादातर देशों की जनता अपने देश के लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं है. प्यू रिसर्च  की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक मेक्सिको, ग्रीस, ब्राजील और स्पेन जैसे देशों की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी अपने लोकतंत्र से असंतुष्ट हैं. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की भी 50 प्रतिशत से ज्यादा जनता ने यही बात मानी थी. हालांकि इस सर्वे में भारत के 54 प्रतिशत लोग अपने देश के लोकतंत्र से खुश थे.

लेकिन बड़ी आबादी वाले देशों में लोकतंत्र के नाम पर दी जाने वाली जरूरत से ज्यादा आज़ादी कई बार परेशानियों की वजह बन जाती है. क्योंकि भारत जैसे बड़े देशों में इसकी आड़ में हर बात पर बंद और आदोलन किए जाते हैं. चाहे मुद्दा नए कानून का हो या फिर एक नई सड़क या बांध बनाने जैसा छोटा सा मुद्दा ही क्यों ना हो.

आबादी के हिसाब से बड़े देश ही नहीं बल्कि उन देशों में भी कई बार लोकतंत्र मुश्किल में पड़ जाता है. जहां की आबादी बहुत कम है.  उदाहरण के लिए 88 लाख की आबादी वाले इज़रायल में पिछले 2 साल में चौथी बार आम चुनाव होने वाले हैं यानी वहां हर 6 महीने में चुनाव हो रहा है. अब आप सोचिए एक छोटा सा देश अपनी जनता को स्थायी सरकार नहीं दे पा रहा तो बड़े बड़े देशों का क्या हाल होता होगा.

बड़े लोकतांत्रिक देशों में ज्यादा आबादी का सिर्फ दोहन किया जाता है. इस आबादी को अन्नदाता, जनता जनार्दन, जवान जिंदाबाद, क्रांतिकारी जैसे शब्दों के जरिए लुभाया जाता है. लेकिन ये सारे शब्द और संज्ञाएं सिर्फ इसलिए इस्तेमाल की जाती हैं ताकि पार्टियां अपने आपको एक चुनावी मशीन में बदल सकें.

अब अगर लोकतंत्र में कमियां हैं तो कहीं न कहीं इसका समाधान भी होगा. इन समाधानों को समझने के लिए आपको एक बार 2400 वर्ष पूर्व के ग्रीस में चलना होगा. 2400 वर्ष पहले ग्रीस में एक बहुत बड़े इतिहासकार हुए, जिनका नाम था थ्यूाीडाइड्स. इन्होंने पेलो पोनेशियन वॉर का इतिहास लिखा था. वो इसमें उस समय के एथेंस के महान राजनेता पेरिक्लीज़ का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि इस नेता को लोकतांत्रिक तरीके से चुना गया था. वो तानाशाह नहीं थे लेकिन फिर भी एथेंस की जनता को अपने इशारों पर नचाते थे. इस राजनेता को जब भी लगता था कि जनता में अहंकार आ गया और जनता में ज़्यादा आत्मविश्वास आ गया है तो वो जनता के मन में डर बैठा देते थे और जब उन्हें लगता था कि जनता बिना किसी कारण के डरी हुई है तो वो एक बार फिर जनता में आत्मविश्वास जगा देते थे. ये खेल ऐसे ही चलता रहता था और जनता इस राजनेता के इशारे पर नाचती रहती थी.

आप गौर करेंगे तो भारत में 70 वर्षों तक सरकारें चलाने वाले राजनेताओं ने भी ऐसा ही किया और इसका नतीजा ये हुआ कि कभी भारत का लोकतंत्र डरे सहमे लोकतंत्र में बदल जाता है तो कभी ज़रूरत से ज़्यादा लोकतंत्र, सुधारों की प्रक्रिया को रोक देता है.

इसी तरह ग्रीस के दर्शन शास्त्री प्लेटो पांच तरह की शासन व्यवस्थाओं का ज़िक्र करते हैं.

वो कहते हैं कि पहली शासन व्यवस्था एरिस्टोक्रेसी होती है जिसे एक दार्शनिक राजा चलाता है और फ़ैसले लेने में उनकी भूमिका होती है जो इसके योग्य होते हैं. यानी फ़ैसला लेने का हक़ लोगों को उनकी मेरिट के हिसाब से दिया जाता है. इसे आप मेरिटोक्रेसी भी कह सकते हैं. ऐसी व्यवस्था में भीड़ फ़ैसले नहीं लेती, बल्कि पढ़े लिखे अनुभवी और समझदार लोग फ़ैसला लेते हैं.

दूसरी शासन व्यवस्था है टिमोक्रेसी इसका जन्म पहली शासन व्यवस्था का स्वरूप बिगड़ने पर होता है. इसमें सत्ता में बैठे लोग ताक़त के भूखे होते हैं और इसके शासक हर समय युद्ध के लिए तैयार होते हैं.

इसके बाद जब इस व्यवस्था का स्वरूप भी बिगड़ने लगता है तो ओलीगार्की का जन्म होता है. इस व्यवस्था में पैसा ही नेताओं के लिए सबकुछ हो जाता है और वो सारे फ़ैसले इसी आधार पर लेते हैं कि इससे उनकी संपत्ति में कितना इज़ाफ़ा होगा.

फिर नंबर आता है लोकतंत्र का. जहां स्वतंत्रता को सबसे ऊपर रखा जाता है. जहां आज़ादी ही सबसे बड़ी होती है. लेकिन धीरे धीरे ये आज़ादी ग़ुलामी में बदलने लगती है. आज़ादी के नाम पर कई बार लोग कानून भी तोड़ने लगते हैं और फिर स्थितियां अराजक होने लगती हैं.

आख़िर में नंबर आता है निरंकुश शासन व्यवस्था का, इसमें एक ऐसे नेता का जन्म होता है जो पहले तो लोगों को उनके अधिकार देने के सपने दिखाता है. लेकिन फिर वो एक तानाशाह में बदल जाता है.

अब ये ज़रूरी नहीं है कि आज के दौर में भी सभी शासन व्यवस्थाएं इन्हीं पांच पड़ावों से होकर गुज़रें. लेकिन ये सब हमने आपको ये समझाने के लिए बताया है कि कई बार जो सफ़र राम राज्य से शुरू होता है वो लोकतंत्र की सड़कों से गुज़रते हुए निरंकुश शासन तक पहुंच जाता है और सत्ता के लोभी नेता खुद को चुनावी मशीन में बदलकर ये सपना पूरा करें. उससे पहले लोकतंत्र की कमियों को दूर कर लिया जाना चाहिए.

और इसका सबसे अच्छा तरीका है, संविधान का 100 प्रतिशत पालन. अगर हर प्रक्रिया संविधान का 100 प्रतिशत पालन करते हुए पूरी की जाए तो फिर निरंकुश होने की स्थिति नहीं आएगी और लोकतंत्र अपने सही स्वरूप में कायम रह पाएगा. लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा लोकतंत्र की अभिलाषा संविधान में कही गई बातों की परवाह नहीं करती और नतीजा आपके सामने है.

लोकतंत्र का स्वरूप बिगड़ने पर कानूनों का भी कोई फ़ायदा नहीं रह जाता. भारत में आईपीसी की 511 और सीआरपीसी की 484 धाराएं हैं. लेकिन आप देखेंगे कि ज़्यादातर मौकों पर इन कानूनों का भी ख़ौफ़ लोगों के मन में नहीं होता.

लेकिन समस्या को दूर करने का एक उपाय ये है कि लोकतंत्र, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और स्वंतत्र मीडिया के जिन चार स्तंभों पर खड़ा है. उन्हें मज़बूत बनाया जाए, जब ये चार स्तंभ मज़बूत होंगे तो नेता भी निरंकुश नहीं होंगे और जनता भी संविधान का सम्मान करना सीख जाएगी.

लोकतंत्र का स्वरूप बिगड़ने पर कानूनों का भी कोई फ़ायदा नहीं रह जाता. भारत में आईपीसी की 511 और सीआरपीसी की 484 धाराएं हैं. लेकिन आप देखेंगे कि ज़्यादातर मौकों पर इन कानूनों का भी ख़ौफ़ लोगों के मन में नहीं होता.

लेकिन समस्या को दूर करने का एक उपाय ये है कि लोकतंत्र न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और स्वंतत्र मीडिया के जिन चार स्तंभों पर खड़ा है. उन्हें मज़बूत बनाया जाए, जब ये चार स्तंभ मज़बूत होंगे तो नेता भी निरंकुश नहीं होंगे और जनता भी संविधान का सम्मान करना सीख जाएगी.

इस समय भारत में जैसा सुधार लाने की कोशिश हो रही है. वर्ष 1980 के दशक में ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के सामने भी ऐसे ही बड़े सुधार लाने की चुनौती थी. जब भी कोई बड़ा सुधार किया जाता है तो लोगों के मन में डर होता है और उसके खिलाफ प्रदर्शन होते हैं. तब ब्रिटेन में भी सुधारों का विरोध किया गया था. हालांकि इसके बावजूद मार्गरेट थैचर ने आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया जारी रखी थी. इसलिए उन्हें आयरन लेडी का नाम दिया गया. अगर तब वो दबाव के सामने झुक जातीं तो आज दुनिया उन्हें आयरन लेडी के नाम से नहीं जानती. हालांकि मार्गरेट थैचर के सामने इतनी बड़ी चुनौतियां नहीं थीं जितनी आज भारत की सरकार के सामने हैं.

अक्सर किसी देश का सुनहरा भविष्य वहां के किसी एक नेता की दूर.दर्शिता यानी विजन का नतीजा होता है. सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने भी ऐसा ही किया था. वो लगातार 31 वर्षों तक वहां के प्रधानमंत्री रहे और उन्होंने सिंगापुर को थर्ड वर्ल््ड कंट्री से दुनिया के विकसित देशों में एक बना दिया. हालांकि सिंगापुर में लोकतंत्र है, फिर भी सरकार में आम जनता की भागीदारी को लेकर ली कुआन यू के विचार अलग थे. उन्होंने कहा था कि रवांडा, बांग्लादेश और कंबोडिया जैसे देशों में भी लोकतंत्र है. लेकिन लोकतंत्र के बावजूद वहां का समाज सभ्य नहीं है. किसी भी देश के लोगों का सबसे पहले आर्थिक विकास होना चाहिए. वहां के नेता चाहे जो भी कहें, नागरिकों को घर, दवाईयां, नौकरी और स्कूलों की ज़रूरत है.

वर्ष 1980 में सिंगापुर एयरलाइंस की पायलट यूनियन ने हड़ताल की थी. तब ली कुआन यू ने उनकी मांगों को मानने के बदले, उन्हें काम पर वापस लौटने की चेतावनी दी थी और ये भी कहा था कि अगर हड़ताल तुरंत खत्म नहीं हुई तो वो सिंगापुर एयरलाइंस को बंद करके नए सिरे से शुरू  करने के लिए तैयार हैं. इसके बाद हड़ताल ख़त्म हो गई थी. 



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