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पुलिस की यूनिफॉर्म का रंग क्यों होता है ‘खाकी’, जानिए दिलचस्प किस्सा

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नई दिल्लीः पुलिस (Police) की पहचान उसके काम से ज्यादा खाकी वर्दी यानी यूनिफॉर्म से होती है. देश भर में सभी राज्यों की पुलिस फोर्स की यूनिफॉर्म खाकी रंग में होती है. फर्क बस इतना है कि कही पर इसका रंग लाइट होता है तो कहीं थोड़ा डार्क. लेकिन आपके दिमाग में कभी ये ख्याल भी आया कि आखिरकार पुलिस की वर्दी का रंग खाकी ही क्यों होता है. आज हम आपको खाकी रंग के पीछे का एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं. आइए जानते हैं क्या है पुलिस की यूनिफॉर्म खाकी होने का कारण. 

ब्रिटिश शासन काल में सफेद थी यूनिफॉर्म
भारत में जब अंग्रेजों का शासन था, तब पुलिस की वर्दी का रंग सफेद हुआ करता था. लेकिन इस दौरान पुलिस कर्मचारियों को इस यूनिफॉर्म से काफी शिकायतें रहती थीं. दरअसल, पुलिस वालों की लंबी ड्यूटी के चलते उनकी यूनिफॉर्म जल्दी गंदी हो जाती थी. वर्दी पर तमाम तरह के दाग धब्बे भी लग जाते थे. इस कारण उन्हें हर रोज इसे साफ करना पड़ता था. बताया जाता है कि ब्रिटिश राज में कई बार तो पुलिस कर्मचारियों ने गंदगी को छुपाने के लिए अपनी वर्दी को अलग-अलग रंगों में रंगना शुरू कर दिया था. यूनिफॉर्म के बार-बार गंदे होने के कारण बाद में ब्रिटिश अफसरों ने इसके बदलाव की एक योजना बनाई. 

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वर्दी के लिए बनवाई गई ‘डाई’
वर्दी कम गंदी दिखाई दे इसलिए पुलिस अधिकारियों ने एक डाई बनवाई, जिसका रंग खाकी था. इस रंग को बनाने के लिए चाय की पत्तियों के पानी का प्रयोग किया गया. इस खाकी रंग की डाई लगाने के बाद पुलिस की वर्दी पर धूल मिटटी, दाग आदि कम दिखाई देने लगे. हालांकि, अब पुलिस की वर्दी में सिंथेटिक रंग का इस्तेमाल किया जाता है. इसके बाद पुलिस वालों ने धीरे-धीरे वर्दी का रंग पूरी तरह से सफेद से खाकी हो गया. खाकी रंग एक हल्के पीले और भूरे रंग का मिश्रण है.

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सर हैरी लम्सडेन ने अपनाया था वर्दी का खाकी रंग
बता दें कि साल 1847 में सर हैरी लम्सडेन (Sir Harry Lumsden) ने एक अधिकारी के तौर पर खाकी रंग की वर्दी को अपनाया था. तभी से भारतीय पुलिस में खाकी रंग की वर्दी चली आ रही है. शुरुआत में पुलिस फोर्स के जवान अपनी लोकल ड्रेस में ड्यूटी करते थे. लेकिन 1847 में सर हैरी लम्सडेन की कोशिश से सभी ने खाकी रंग की वर्दी को अपनाया. उसके बाद आर्मी के रेजिमेंट और पुलिस ने खाकी वर्दी को अपना लिया जो अभी तक भारत में चली आ रही है.

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