मध्य प्रदेश

दिल्ली में किसान आंदोलन पर रांची में सियासत, धान खरीद के मामले पर फिर शुरू तू-तू-मैं-मैं

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रांची: दिल्ली में कृषि क़ानून वापस लेने की मांग को लेकर किसानों का विरोध लगातार जारी है और इधर झारखण्ड से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा गर्म है. सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं, तो राज्य के किसानों की अपनी अलग और स्थायी समस्या है. आखिर किसान आंदोलन की ज़मीनी हकीकत क्या है और सियासी दल समस्याओं को सुलझाने के बजाए. इस मुद्दे को लपकने की जल्दबाजी में क्यों हैं, आइए जानते हैं. 

झारखंड से दिल्ली तक, खेत से सड़कों तक और हर एक नुक्कड़ पर इन दिनों किसान आंदोलन के चर्चे जोरों पर है. ऐसे में सियासी जमात भी किसान हित की बातें कर रहा है. दिल्ली में चल रहे आंदोलन को लेकर झारखंड के मंत्री मिथलेश ठाकुर ने केंद्र के सत्ताधारी दल बीजेपी पर निशाना साधा और कहा कि बीजेपी के झारखंड के नेता घड़ियाली आंसू बहाते हैं. किसान बिल को लेकर आंदोलन करते हैं.

मिथिलेश ठाकुर ने कहा कि झारखंड में धान खरीदी को लेकर मुख्यमंत्री के पुतले फूके जा रहे हैं, लेकिन पूरे देश के किसान दिल्ली में इस कड़ाके की ठंड में सड़कों पर बैठे हैं, लेकिन केंद्र सरकार पूंजीपतियों के हाथ में किसान को गिरवी रखने का काम कर रही है. 

वहीं झारखंड के सत्ता में शामिल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद धीरज प्रसाद साहू ने भी केंद्र सरकार पर कुछ कार्पोरेट घराने को लाभ पहुंचाने के लिए किसान बिल लाने का आरोप लगाया है.

वीओ:-2 वहीं किसानों के मुद्दे पर झारखंड बीजेपी के प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने पलटवार करते हुए कहा कि हेमंत सरकार संवेदनहीन हो गई है..सत्ता में आने से पहले उन्होंने किसानों के ऋण माफी का वादा किया था, लेकिन अबतक नहीं हुआ. इतना ही नहीं पहले से किसानों को जो 5000 रुपए से लकर 25000 की आर्थिक सहायता राशि दी जा रही थी उसे भी हेमंत सरकार ने बंद कर दिया है. सूबे में धान की खरीदारी बंद करने को लेकर भी बीजेपी ने हेमंत सरकार पर पलटवार किया है.

इधर, किसान आंदोलन के समर्थन में चतरा के टंडवा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बिल वापस लेने की मांग को लेकर एक दिवसीय धरना दिया और राज्यपाल के नाम बीडीओ को ज्ञापन सौंपा. एक ओर जहां दिल्ली में किसान आंदोलनरत हैं तो वहीं दिल्ली से 1200 किलोमीटर दूर रांची के आदिवासी बहुल इलाके के किसानों को इस कानून के बारे पता तक नहीं है. किसान आंदोलन से भले ही यहां के किसान वाकिफ नहीं हों लेकिन इन किसानों की अपनी समस्या है.
Edited by:-Adinath Jha



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